साये में धूप

लेखक दुष्यन्त कुमार

“साये में धूप” दुष्यंत कुमार द्वारा लिखी गई ग़ज़लों का एक संग्रह है, जो हिंदी के एक प्रसिद्ध कवि हैं।


प्रथम प्रकाशन तिथि – 01 जनवरी 1975
भाषा – हिंदी
पृष्ठ संख्या – 64
मेरी रेटिंग – 5/5
मेरी पठन सूची क्रमांक – 58
शैली – कविता, भारतीय साहित्य, भारत, कथा साहित्य


Story Brief (No Spoilers) :

No story but book is way better then many stories.

My Experience with Book :

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साये में धूप से कुछ और असरदार पंक्तियाँ—

  1. “न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे,
    ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।”
  2. “आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
    घर अँधेरा देख तू, आकाश के तारे न देख।”
  3. “ये जो दीवार है, ये जो दर है,
    ये सब हमारे ही घर हैं।”
  4. “कैसे आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता,
    एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।”
  5. “इस शहर में कोई बारात हो या वारदात,
    अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ।”
  6. “वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता,
    मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए।”
  7. “यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ,
    मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।”

इन पंक्तियों में सियासत, समाज और इंसानी जज़्बात—तीनों एक साथ साँस लेते हैं। थोड़ा चुभती हैं, थोड़ा जगाती हैं… और फिर देर तक साथ चलती हैं।

साये में धूप से कुछ और तेज़, याद रह जाने वाली पंक्तियाँ—

  1. “ये रोशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगों,
    कि जैसे जल में दिखे हो कोई महल लोगों।”
  2. “कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
    कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता।”
  3. “इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
    नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।”
  4. “यहाँ दरख़्तों के साए में धूप लगती है,
    चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।”
  5. “जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में,
    हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं।”
  6. “अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
    ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।”
  7. “लोग होठों पे लिए फिरते हैं कुछ अरमानों को,
    जैसे दरवाज़े पे टँगे हों ताले पुराने से।”

इन पंक्तियों में शब्द नहीं, छोटे-छोटे तूफ़ान हैं—जो चुपचाप भीतर उठते हैं और सोच की दिशा बदल देते हैं।

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