एक और शाम हुई, रोज़ जैसे सब ऑफिस छोड़ घर को चले गए,
मैं कुछ देर और रहूंगा, यहां की थकान यही उत्तार कर जाऊंगा,

मेहनत उतरने के लिए अब और मेहनत कौन करे,
२-४ लाइनें लिख कर देखता हूं, शायद काम बन जायेगा,

कभी ध्यान दिया है ऑफिस मे कितने रंगों कि दीवारे, और रोशनियां हैं,
इनका ही घर है ये, जहां तुम बिना इनसे पूछे रोज़ चले आते हो,

सब के जाने के बाद ये कुर्सियां मेजे इतनी उदास सी क्यों लगती हैं,
शायद ये सोचती होंगी, कि इनके घर जाने का वक़्त कब आएगा,

मोर्डर्न ऑफिस के ये शीशे कि दीवारे भी अजीब होती है,
अनजाने चेहरो को देखेने तो देती हैं पर बात नहीं करने देती,

पिछली कंपनी मे, आखिरी दिन पर कुछ बहुत अजीब हुआ था,
जिसको मे बेजान समझ था, हर वो चीज मुझे रोकने मे लग गयी थी,

साथ गुजारे सालो का वास्ता दिया जा रहा था बिना मेरी बात सुने,
कुर्शी, दीवार कि पेंटिंग, यहां तक डेस्क पर लगा स्माइली भी रोने लगी थी,

अपने कंप्यूटर को इतनी ऊँगली करते हो, कभी बात भी करके देखो,
गुस्सा हो कर चुप है वो, दोस्ती वाले गाने बजा कर देखो शायद मान जाये,

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