Author – विजय त्रिवेदी
एक विस्तृत जीवनी जो यह दर्शाती है कि कैसे Atal Bihari Vajpayee ने दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर एक सर्वमान्य राजनेता, कवि और तीन बार प्रधानमंत्री के रूप में ऐसी नेतृत्व क्षमता दिखाई, जिसने उन्हें दुर्लभ सर्वदलीय सम्मान दिलाया।
प्रथम प्रकाशन तिथि – 10 अगस्त 2016
भाषा – अंग्रेज़ी
पृष्ठ संख्या – 356
मेरी रेटिंग – 4/5
मेरी पठन सूची # – 43
शैली – जीवनी
पुस्तक से प्रसिद्ध उद्धरण: हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ, गीत नया गाता हूँ।
कहानी संक्षेप (बिना किसी रहस्योद्घाटन के) :
भारत के सबसे सम्मानित और लोकप्रिय राजनेताओं में से एक पर आधारित एक प्रामाणिक जीवनी।
भारतीय इतिहास में ऐसे क्षण बहुत कम आए हैं जब सभी राजनीतिक दल किसी निर्णय पर बिना किसी बहस या विवाद के सहमत हुए हों। अक्सर सर्वसम्मति के पीछे भी अनकही असहमति छिपी रहती है। लेकिन जब एनडीए सरकार ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ प्रदान करने का निर्णय लिया, तब किसी भी दल ने विरोध का स्वर नहीं उठाया। सभी ने एक स्वर में इस निर्णय का स्वागत किया।
वाजपेयी जी ने तीन बार प्रधानमंत्री के रूप में देश की सेवा की — पहले तेरह दिन, फिर तेरह महीने, और उसके बाद पूरे पाँच वर्ष तक। वे कांग्रेस के अलावा किसी अन्य दल से पूर्ण कार्यकाल पूरा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बने।
आख़िर उनके व्यक्तित्व में ऐसा क्या था कि वे सभी दलों और विचारधाराओं में समान रूप से सम्मानित रहे? क्या वे सचमुच “गलत पार्टी में सही व्यक्ति” थे, जैसा कुछ लोग मानते थे?
यह जीवनी उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को उजागर करती है — एक दूरदर्शी राजनेता, प्रभावशाली नेता, संवेदनशील पत्रकार और कवि के रूप में — जिन्हें भारत के सबसे सफल और आदरणीय प्रधानमंत्रियों में गिना जाता है।
पुस्तक के साथ मेरा अनुभव :
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Atal Bihari Vajpayee मेरे प्रेरणास्रोतों में से एक रहे हैं। उनके जीवन पर आधारित इस पुस्तक को पढ़ना केवल पढ़ना नहीं था, बल्कि एक विचारयात्रा पर निकलना था। हर अध्याय ने यह याद दिलाया कि सच्चा नेतृत्व पद से नहीं, व्यक्तित्व से बनता है।
यह पुस्तक इसलिए भी खास है क्योंकि यह हिंदी में है। जिस भाषा में वाजपेयी जी ने कविता लिखी, भावनाएँ व्यक्त कीं और राष्ट्र से संवाद किया, उसी भाषा में उनकी जीवनगाथा पढ़ना आत्मा को छू लेने वाला अनुभव बन जाता है। शब्द केवल सूचना नहीं देते, वे प्रेरणा जगाते हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि यह पुस्तक अंधभक्ति नहीं करती। इसमें उनके संघर्ष, असफलताएँ, निर्णयों की दृढ़ता और कभी कभी निर्णय लेने में हुई चूक, सब कुछ ईमानदारी से रखा गया है। यही संतुलन इसे शक्तिशाली बनाता है। यह सिखाती है कि महानता का अर्थ त्रुटिहीन होना नहीं, बल्कि हर चुनौती से सीखकर आगे बढ़ना है।
जो भी व्यक्ति नेतृत्व, साहस और मूल्यों की राजनीति को समझना चाहता है, उसके लिए यह पुस्तक केवल अनुशंसित नहीं, बल्कि आवश्यक है।
